Skip to main content

"अपने अवगुणों को ढकते हुए"



"अपने अवगुणों को ढकते हुए"
************************************

फिर रख दूंगा अखबारों में तह करके
यह शाल किसी आलमारी में
अगले बरस तक याद ना आयेगी
और फिर एक दिन ढूंढून्गा किसी
कंपकपा देने वाली सर्दी में अगले बरस
सालों से जारी है सिलसिला शाल का
इस तरह से कितनी ही शालें आती रही
गुमती रही, कभी कोई ले गया और
लौटाई नहीं भलमानसहत में पूछा नहीं
कभी ट्रेन में, कभी शादी में गुम गयी
हर बार एक शाल के लिए दुनिया घूमा
कभी तिब्बती से, कभी रेडीमेड वाले से
पर हर बार झिक झिक करके नई खरीदी
कभी कोई दे गया माँ को तो
हड़प ली झपटकर कि अच्छी है
ओढ़ा तो लगा हर बार गुमने का खटका था
जतन से सम्हालता और सहेजता
कभी एक बार तो कभी दो बार
धो लिया सीजन में शाल को हलके से
कभी शाल को अपने रोज की जिन्दगी में
वह स्थान नहीं दे पाया जिसका हक़
वह रखती थी, एक अदद स्थान जीवन में
शाल के रेशे यहाँ वहाँ गड़ते रहते और
उधड़ते रहते जीवन के ख़्वाबों की तरह
शाल के रंगों की तरह बदलता रहा यार दोस्त
हर बार या तो गुम गए या ले गया कोई
मंजिलों और रास्तों के बीच मेरे सारे अवगुण
छुपाती रही शाल और बचाती रही सर्द हवाओं से
धुल और गुबार से, कोहरे और ओंस की बूंदों से
आज याद करता हूँ फीकी पड़ी हुई शालों को
एक गठरी निकल आती है संसार के कोनों-कोनों से
और शालों के बीच से आवाजें रेंगती है आहिस्ते से
यह अवगुणों की दास्तान है या सदियों की गर्द
अपने आपसे पूछता हूँ तो एक झूठ बोल लेता हूँ
शाल को एक बार फिर से समेटने का वक्त है
और मेरे सामने फिर से यह लाल शाल पड़ी है
एक प्रश्न, एक विचार और एक अवागर्द की भाँती
सवाल यह है कि अब इसे सहेजने की हिम्मत नहीं है
लगता है अब उधेड़ दूं रेशा-रेशा और आने दूं हवाओं को.
यह सही समय है शाल समेटने का क्योकि अब
चिंता नहीं है कि आगे मौसम में शाल कैसे आयेगी
शाल का एक ढेर देख रहा हूँ, देख रहा हूँ ढेर और ढेर
अफसोस यह है कि इतने शालों का इस्तेमाल नहीं होगा.

- संदीप नाईक 
25 जनवरी 2015 


Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ

एक जंगल था। उसमें में हर तरह के जानवर रहते थे। एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ। जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया। एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया। बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने की मदद मांगी।बन्दर शेर की गुफा के पास गया और गुफा में बच्चे को देखा, पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई। बन्दर राजा गुफा के पेड़ो पर उछाल लगाता रहा.. कई दिन ऐसे ही उछाल कूद में गुजर गए। तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा .." राजा जी मेरा बच्चा कब लाओगे.. ?" इस बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोले "-: .. . . . हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ "

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...