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सतर्कता भरी निराशा बेहतर है उद्दाम आशा से



ये मस्लोहत है, तवज्जो है कि साजिश|
कि मेरे दुश्मन ने मेरे हक़ में दुआ माँगी है।|


पता नहीं क्यों बहुत ज्यादा भ्रम बढ़ गया है और कुछ समझ नहीं आ रहा है, ये भ्रम सारे उजालों और अंधेरों को लेकर है , सारी अस्मिता और पहचान को लेकर है और जीवन के शाश्वत स्वरुप को लेकर भी है। असल में गफलत शुरू होती है जब हम अपने पर, कर्म और ध्येय पर सोचना शुरू करते है। द्वन्द, मूल्य और अपने होने करने के बीच अपने को बचाने की जद्दोजहद और फिर एक हद तक समझौते और सब कुछ बार बार समेट कर बिखरने का दर्द... मायूसी और हताशा बस .....

एक अंजाम तक पहुँचना अब बेहद ज़रूरी है। कोई जवाब सच में है क्या आदि ?


आधी रात को जब हम अपने भीतर खटखटाते है तो जवाब नहीं आते और लगता है सारी उम्र यही करते रहने के बाद भी कोई सुगबुगाहट नहीं होती फिर सोचते है कि ये सन्नाटा क्यों???

सतर्कता भरी निराशा बेहतर है उद्दाम आशा से

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