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ज़िंदगी में दौडते दौडते इतना थक गया हूँ

ज़िंदगी से जब सब कुछ खत्म हो जाता है तो एक विदूषकीय चरित्र बन जाता है अच्छा भला आदमी, बेहतर है इसे खुद स्वीकार लें बजाय इसके कि कोई और कहें.

नहीं, मेरा दर्द तुम कभी नहीं समझ पाओगे, एक दिन तुम्हें कहूँगा कि संदीप नाईक के खिलाफ संदीप नाईक का मुकदमा लड़ो संदीप नाईक...........

ज़िंदगी में दौडते दौडते इतना थक गया हूँ कि अब कही थक कर बैठने से डरता हूँ कि खामोश देखकर मौत अपने पंजे ना फैला दें और ठीक इसके विपरीत दौडते दौडते स्वप्नों की अंधी दौड़ में शामिल ना हो जाऊं कही..........

किसी से क्या नाराज होना, अपने आप से नाराज होकर अगर हम मोक्ष का सोच रहे है तो क्या गलत है............और फ़िर वही तो करना है जो बसका अंत में होगा, बेहतर है चुन लें अभी से बजाय घसीट घसीटकर जीने से..............

हम सब लौटना ही तो चाहते है इसी ओर, इसी दिशा में, इसी प्रारब्ध की ओर फ़िर काहे को संकोच , फ़िर काहे का लोभ और माया, फ़िर काहे की देरी.............चले आओ, लौट आओ, बस एक बार सिर्फ एक बार लौट आओ........ सुनो जीवन यही से शुरू होगा फ़िर एक बार सुना है ना फीनिक्स पक्षी के बारे में...............??? लौट आओ, बस एक बार, यही से साँसों का सफर खत्म होता है और अनहद नाद भी .........

तुमने तो कहा था चलने का, लगा भी था कि तुम दौड़ रहे हो, पर ये क्या तुम तो वही हो जहाँ मै छोड़ आया था...........क्या रेंग भी नहीं पाए इतना कि इन कछुओं से ही बाजी लगा सको.......? ये कछुए जो पीठ पर मोटी चमड़ी लिए यहाँ वहाँ अपना जमीर और मुँह दोनों अंदर ढांककर लगातार खरगोशों से रेस लगाकर जीतने के दिवास्वप्न देख रहे है ...............

सुन रहे हो ना.... तुमसे ही कह रहा हूँ कुछ भी नाम हो सकता है तुम्हारा.........अजय, विजय, विकास, गगन, आकाश या अनिल, सुनील, भास्कर, सचिन या मोहन, सोहन या लीला, रेखा, अनिता, सुनीता या और भी कुछ जो दूर तक गूँज रहा हो महानता के आगोश में डूबकर ........


वहाँ इतनी बारिश और यहाँ इतना सूखा, जीवन भी कैसा होता है, कभी कुछ सार्थक होता घटते हुए देख पाउँगा..... अब जब समय की सुईयां इतनी तेजी से अपने मंतव्य की ओर बढ़ चुकी है जिन्हे पकडना अब नामुमकिन है ............सुन रहे हो, कहाँ हो तुम.......

यदि किसी से आपको जलन हो रही है तो यह अच्छी बात है यकीन मानिए................एक बार दिल भरके जल भुनकर देखिये...............

रातें आ रही है और फ़िर चली भी जायेगी, बचेंगी तो सिर्फ यादें और एक दिन यह भी होगा कि रात, रात ही में ढह जायेगी और हम कभी आँख नहीं खोल पायेंगे और सुबह का सूरज नहीं देख पायेंगे.............ऐसी ही एक रात के इंतज़ार में ........आमीन.......

कोशिश तो फ़िर भी करना होगी कि हम आखिरी सांस के समय सचेत रहे और देख सके कि हमने क्या पाया और क्या खोया नहीं, सिर्फ पाया था............जिसे अब सहेजे नहीं बल्कि छोड़कर चले ही जाना है........बस ऐसी ही किसी सांस के इंतज़ार में..........

आमीन.

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