Skip to main content

"​लूटेरा" एक नायाब फिल्म है जिसे बाबा नागार्जुन की कविता और ओ'हेनरी की कहानी ने अप्रतिम बना दिया है.

​"​लूटेरा" एक नायाब फिल्म है जिसे बाबा नागार्जुन की कविता और ओ'हेनरी की कहानी ने अप्रतिम बना दिया है. 

कई दिनोँ तक चूल्हा रोया,
चक्की रही उदास,
कई दिनोँ तक कानी कुतिया ​सो​ई उसके पास,
कई दिनोँ तक लगी भीत पर छिपकलियोँ की गश्त,
कई दिनोँ तक चूहोँ की भी हालत रही शिकस्त ।
दाने आए घर के अंदर कई दिनोँ के बाद,
धुंआ उठा आंगन से ऊपर कई दिनोँ के बाद,
चमक उठी घर भर की आंखेँ कई दिनोँ के बाद,
कौए ने खुजलाई पांखेँ कई दिनोँ के बाद ।

-बाबा नागार्जुन

बस थोड़ा धीरज चाहिए क्योकि स्पीड काफी धीमी और बहुत कम कलाकार है . पर सोनाक्षी और रणधीर के अभिनय ने इस फिल्म को एक ऐसा विस्तार दिया है कि यह फिल्म ना चाहते हुए भी आपके मस्तिष्क में लम्बे समय तक बनी रहेगी . डलहौजी की खूबसूरत वादियाँ और  जमींदारी प्रथा, बंगाली संस्कृति और परम्पराएं, अपराध और छोटे कस्बों में पुलिस का रोल, ​प्रेम में समर्पण,  और फिर सबसे ज्यादा एक गति जो पूरी  फिल्म में इतनी धीमी है मानो हम कही किसी कोने में अपनी छाती पकडे धैर्य और कौतुक से आगे के घटनाक्रम को महसूस करना चाहते है और जिसे अंग्रेजी में एंटी सिपेशन कहते है, करते हुए निदेशक हमें ठीक उसी और ले जाता है जहां हम जाना चाहते है. विवेक मोटवानी का निर्देशन कही भी ढीला नहीं होता, बस शायद कुछ लोगों को लग सकता है कि यह एक कसी हुई फिल्म नहीं है पर जिस कोमलता से बाबा की कविता से यह फिल्म शुरू होती है वह ओ'हेनरी की कहानी पर जिस अंदाज में ख़त्म होती है वह बेहद दुखी करने वाला है. फिल्म  में गीत ठीक ठाक ही है, दृश्य बहुत सुहाने है और दिल करता है मानो एक बार तो कम से कम जीवन में डलहौजी के उस हसीन दिलकश नजारों में  डूब के आया जाए और फिर कही से खोजा जाए एक ऐसा पेड़ जिसकी पत्ती से जीवन सांस लेता है. लूटेरा एक शब्द है जो आख़िरी में आपका दिल लूट लेता है और जब तक आप सम्हालते है वो आपको अमन चैन भी ले जाता है. रणधीर का अभिनय सोनाक्षी से ज्यादा संजीदा है और जिस मासूमियत से वो अंत में सोनाक्षी के साथ रहकर उसकी सेवा करके उसे एक नया जीवन देता है, अपने जीवन की सबसे खूबसूरत पेंटिंग बनाता है वह उसे अमर बना देता है.  लूटेरा एक फिल्म ही नहीं, अपने समय के विक्षप्त समय में खोते जा रहे प्रेम, समर्पण और मजबूरी की दास्तान है. एक ऐसी दास्ताँ जिससे हम आप रोज़ दो चार होते है और जीवन ढोने के क्रम में बदस्तूर ढोते  जाते है.  अगर थोड़ी बहुत भी संवेदनाएं है तो यह फिल्म देखी जानी चाहिए क्योकि राँझना प्रेम की अलग भूमि पर निहायत ही अप्रतिम फिल्म है जो तेजी से हेपनिंग वाली फिल्म है वही लूटेरा एक मद्धम ताल पर धीमें  धीमे चलते हुए ठीक भैरवी की तरह ख़त्म होती है जहां मंच पर बैठे कलाकारों की आपसी जुगल बंदी एक स्थायी प्रभाव छोड़ती है. और उठाते समय हर दर्शक इतना सन्न रह जाता है कि उसे समझ नहीं आता की क्या हो गया और क्या किया जाना है. मेरी राय में एक बार जरुर देखिये बस थोडा धैर्य कही से खरीदकर ले जाईयेगा. 

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

आशिक की है बारात - जरा झूमके निकले. 27 April 2017

भौंडी आवाज में गरीब बैंड वालों को गवाने वालों, ढोल और ताशों से दूसरों का चैन छिनने वालों, सड़कों पर घटिया नाच कर ट्रैफिक जाम करने वालों - जाओ तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारे वैवाहिक जीवन मे इससे ज्यादा कलह और शोर हो, तुम्हारी जीवन गाड़ी हमेंशा किसी ट्रैफिक में दबकर सिसकती रहें और तुम अपनी घरवाली के ढोल ताशों पर ताउम्र नाचते रहो और कोई एक चवन्नी भी ना लुटाएं, तुम्हारे जीवन मे बिजली ना आये और ऐसा अंधेरा छा जाएं कि तुम एक जुगनू के लिए तरस जाओ। शादी कर रहे हो तो क्या किसी के बाप  पर एहसान कर रहे हो - साला रात रात भर पुट्ठे हिलाकर नाचते हो और दूसरों की नींद हराम करते हो, बारात में घण्टों सड़कों पर मटकते रहते हो, तुम्हारी शादी क्या इतिहास में पहली बार हो रही ? साला अपना जीवन तो नर्क बनाओगे ही शादी के बाद - उसके मातम में हम सबको क्यों लपेटे में लेते हो ? और प्रशासन , पुलिस खींसे निपोरकर नाचते लौंडों और पसीने में नहाती औरतों को घूरकर मजे से देखती रहती है कि कही कुछ दिख जाए, सड़क पर और छतों पर खड़े लोग काल भैरव को मन्नत करते है कि कुछ सामान दिख जाए तो दिन बन जाएं - इन सब बारातियों...

सतरें जीवन के - तटस्थ Satare Jivan ke

सतरें जीवन के   जब प्रवाह में बह जाने का समय आता है, लगता है कि अब सब खत्म हो ही रहा है - अचानक एक तिनका कही से तैरते हुए आ जाता है और शिद्दत से थाम लेता है यह कहकर कि धैर्य रखो, शांत हो जाओ - उजाले की किरणें छटा बिखेरेंगी जल्दी ही शाम ओस से भीगी हुई एक कविता है जिसने संसार में अपनी लय से सबको बाँध रखा है जीवन झूठ का पुलिंदा है और हम सब इसे पसंद करते है, हम सब झूठ के साम्राज्य को बनाये रखना चाहते है और इसी उपक्रम में मरने तक मेहनत करते रहते हैं, अंत में मौत का सच इसकी हवा निकाल देता है अयोग्यता ही असली धन और शांति है, जब तक अयोग्य लोग है तब तक योग्यता की असली और वीभत्स सच्चाई सामने आती रहेगी जो स्वाभाविक ना होकर ना - ना प्रकार के कृत्रिम संसाधनों से अर्जित कर सुख सम्पदा हासिल करने के लिए बेहतरीन स्वांग के साथ ओढ़ी गई है हारना और स्वीकारना हिम्मत का काम है और इसकी जड़ें बहुत गहरी होती है, अपूर्णताएँ, अकुशलताएँ और अधकचरी थोथी सूचनाएँ जीवन के उत्तरार्ध में आपको एहसास दिलाती है कि आपके सारे प्रयास, अभ्यास और चेष्टाएँ व्यर्थ है - इसलिये ख़ारिज करो अपने हर कर्म को, समझ को, देख...