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Man Ko Chiththi, Drisht Kavi and other Posts from 21 to 24 November 2024

मुझे शहर, गाँव, नदी, पहाड़ और पगडंडी किनारे बसी बस्तियाँ याद आती है, झोपड़ियों से उठता धुआँ, बकरियों का कूदना, मुर्गे की लड़ाई और वह सब याद आता है जिससे जीवन है और साँसे है, पीछे देखता हूँ तो याद आता है जब पक्की सड़क छोड़कर उस ओर चला, गाड़ी मुड़ गई, धीमी हो गई और फिर खेतों से लौटते किसान, दौड़ते हुए बच्चों की किलकारी, ठिठोली करती महिलाओं के झुण्ड, इशारों में बात करती नवयौवनाएँ, जगह - जगह बैठे और किशोरियों को घूरते युवाओं के समूह याद आ रहें हैं, किसी टपरी में बैठकर वरुण के साथ पी काली चाय और आसपास बीड़ी का धुआँ और फसलों की चिंता वाली बहस करते लोग - उस टपरी में दो टाँग टूटी लकड़ी की बेंच जिसके दो और ईंटों का सहारा है
उमरिया के कोने में खड़ा अपने निर्जन को ढोता मन्दिर, तवांग जिले की रपटीली सड़क पर बैठा वो जोड़ा - जिसमें लड़की अगली सुबह दिल्ली लौट जाने वाली थी पढ़ने और लड़का अपनी फौजी यूनिट में - पता नही वो फिर कभी मिलें या नही, मझगंवा के दूरस्थ गांव में उस पेड़ पर कितने महुआ के फूल आये - याद नही, पर जब मैं उस रात वहाँ रुका था तो कोई कहानी सुना रहा था कि अब इस पेड़ पर भूतों का कब्ज़ा है और सारे महुए के फूलों का रस भूत पी जायेंगे, बनासकांठा के उस गाँव की भी स्मृति है जब भानु खेत में ले गया था और ढेर काम करने वालों के बीच पानी की कहानी सुनी थी - पानी की दुखभरी विषैली स्मृतियाँ जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर के अंदर के गाँवों की है - जहाँ जब मैं दोनो हथेलियाँ भर पानी पीतल की छोटी सी बाल्टी से भरता तो घर की औरतें और बुजुर्ग मुझे यूँ देखते जैसे मैंने उनका सर्वस्व हर लिया हो, उनकी आँखों का ख़ौफ़ आज भी मुझे एक भरा ग्लास पानी नही लेने देता, सात आठ इंच बरसात बमुश्किल होती थी, अनुपम मिश्र भी ज़ेहन में कौंध जाते है गांधी के राजघाट पर दिल्ली में पानी का जग और एक चौथाई ग्लास पानी लिए की "यह पी लो, फिर और दूँगा - फेंकना मत जरा सा भी पानी" भोपाल के प्लेटिनम प्लाज़ा के बेसमेंट में बैठे नर्मदा आंदोलन में आये सैंकड़ों लोग याद आये - जब वे न्यू मार्केट में प्रदर्शन करने निमाड़ से आये थे और तेज बरसात होने लगी, दो रात उस बेसमेंट में घुटनों के ऊपर तक भरे पानी में हम सब लोग जमा थे और तमाम शहर के लोग अपने सुरक्षित घरों में बरसात का सुख ले रहे थे, सप्तपर्णी के पेड़ों की कतार के साथ विलुप्त होते पेड़ो की भरी पूरी श्रृंखला मैंने ग्वालियर के एक निजी विवि के कुलपति के घर में देखी थी - वो सुवास याद कर आज भी मन मयूर हो जाता है और स्व सिस्टर बर्टी के सरकारी आवास के निर्जन कोने में नीलगिरी के पेड़ों की लंबी पँक्ति और धूप के साये में लम्बी दोपहरें - मन भीग जाता है सब कुछ याद करके
कन्याकुमारी के वो बच्चे जो समुद्र से सिक्के निकाल लेते है जब आप विवेकानंद रॉक जाते समय स्टीमर से पैसे पानी में फेंकते है तो, त्रिचूर या अल्लेप्पी के नारियल के पेड़ पर चढ़े वो जवान लड़के जो दर्जनों नारियल पीठ पर लादकर उतरते थे, दंतेवाड़ा में चावल की सल्फी बेचती और ताजी मछलियां तलकर बेचती स्त्रियाँ या मद्रास के मरीना बीच पर केंकड़े तलती औरतें जो बोलती तो लगता लड़ रही हो, महाबलीपुरम में स्टार फल पर नमक मिर्च लगाकर बेचते लोग और कोच्चि में तस्वीरें खिंचवाने का आग्रह करते फोटोग्राफर - मुन्नार के चाय बागान या कालाहांडी गजपति जिलों के अतिपिछड़े आदिवासी जो जंगल से घर लौटते समय कुछ ना कुछ उखाड़ लाते कि यही बेचकर घर में आज शाम चूल्हा जलेगा, जोबट, थांदला या वालपुर में ताड़ी उतारते आदिवासी और मक्का के पानिये बनाकर प्यार से खिलाते हमारे भील भाई बहन
कवर्धा के पंडरिया ब्लॉक के जमीन से 1400 फ़ीट ऊपर बसे बैगा गाँव तेलियापानी के बैगा याद करके मैं रिश्तों को परिभाषित करता हूँ - आठ, दस दिन बगैर गेहूँ या चावल के कब निकल जाते - कोदो - कूटकी या जंगली भाजी खाते हुए, महुआ - इमली के लड्डू और अलग - अलग प्रकार के मशरूम, पन्ना में स्व यूसुफ भाई के साथ चिरायता, पडोर और ना जाने काहे - काहे की सब्जी और भिन्न प्रकार के कांदे - सरसो के खेत, पानी की झिर से आती आवाज़ें, पानी से भरे लबालब तालाब, कूनो के जंगलों से मीठे रसीले बेलफल बीनना और वही किसी देहाती की भाँति ज़मीन पर बैठकर फोड़कर खाना - आसपास से गुजरते सहरियाओं की लड़कियाँ शर्माते लजाते निकल जाती
दशहरे से पहले और दिसम्बर तक जो मादक खुशबू खेतों - खलिहानों और पगडंडियों से आती है वह सोचकर ही मन प्रफुल्लित हो उठता है, गुमला के सरणा, उराँव आदिवासी और दूर किसी गाँव के चर्च में इकठ्ठे हुए सिस्टर्, ब्रदर्स और पादरियों की कौतूहल से तकती आँखें याद आ रही है आज, डिंडौरी के सबसे आख़िरी गाँव की वो होस्टल वार्डन जिसके पति पहाड़ी के उस पार छग में कही पटवारी है, वो रोज शाम को होस्टल के दरवाजे पर दुआ मांगती है कि कही आज नीलगाय या भालू या कोई ऐसा जानवर ना दिखें मेरे पति को कि उसे रात भर पेड़ पर चढ़कर रहना पड़े, सोलर लैम्प के नीचे वह कोई पोथी पढ़ती है किसी देव की और साइकिल की खड़खड़ सुन उसका चेहरा चहक़ उठता है और वह भागकर सफ़ेद मक्का का पैंच बनाती है
अलीराजपुर के कट्ठीवाड़ा में एक स्त्री सारी सुविधाएँ छोड़कर अपने विदेशी पति के साथ वर्षों से काम कर रही है - वे दोनों वही खाते है जो उगाते है, उस शाम जब मैं वहाँ था तो वह छह फुट का विदेशी कुएँ में मोटर ठीक करने उतरा था और देर शाम तक अंदर रहा, अंधेरा होने पर वह स्त्री जिसने सात जन्मों का हाथ थामा था युगन - युगन के जोगी की तरह, कंदील की लौ हाथ में देर रात तक बैठी रही कि इस लौ के उजाले में मोटर ठीक हो जाये और आखिर रात डेढ़ बजे पानी जब उद्दाम वेग से पाइप के जरिये ऊपर आया तो हमने खुशी मनाई और पारले जी बिस्किट खाये थे एक पूड़े में से
ये छोटी खुशियाँ आज की तमाम खुशियों और सुविधाओं के आगे तुच्छ हैं और मेरा बहुत मन है कि एक बार हिम्मत करके इन सबको एक बार फिर जी लूँ - कितना तो पा लिया जीवन में, अब कुछ शेष नही और जो है हाथ में वह व्यर्थ ही है
हिम्मत तो है पर समय नही है शेष अब
***
जन्म के पहले से हम लड़ना आरम्भ करते है, जन्म की पीड़ादायी प्रक्रिया के बाद जीवन से लड़ाई शुरू होती है और हम लड़ते हुए जीतते है, हारते हैं - कभी खुश होते है, कभी दुखी
हर जीत और हार में अपने को समझा ले जाते है कि यह अस्थाई है - इससे फ़र्क़ नही पड़ेगा, हर वक्त एक लम्बा पथ इंतज़ार कर रहा होता है और हर बार पुनः - पुनः लौटकर हम जीवन के दुर्गम पथ पर लौट आते है, लौट आते है कि कोई उम्मीद भीतर होती है, लड़ने का माद्दा बना रहता है, कि लगता है हम फिर निकल जायेंगे किसी सेफ़ प्लेस से और सब कुछ ठीक हो जायेगा एक दिन
पर एक समय बाद लगने लगता है कि सब भ्रम है और असली लड़ाई कुछ और है, कुछ और है जो चूक रहा है, छूट रहा है और अब नही हो सकेगा कुछ
अपने भीतर की तड़फ देखती है कि आप और किसी से नही - अपने आप से हारने लगे हो, "करेज" खत्म हो रही है और एक मुर्दा शांति कही भीतर पसर रही हैं - और बस यही वह बिंदु होता है जब लगता है कि आपने हार मान ली है और अब कही कोई उम्मीद नही है, सबसे जीत सकते है हम पर अपने आपसे जीतना बहुत मुश्किल है
अपने आप से, अपनी हारी बीमारी या अपनी उम्मीदों से हार जाना, सबसे बड़ी हार है और एक समय पर यह एहसास जब पुख़्ता होने लगता है तो आप मोह - माया तजकर निर्द्वन्द और तटस्थ होकर चलने को तैयार हो जाते हो - उस मार्ग पर चलने को जहाँ सबको अकेले ही यात्रा करनी है
कष्ट सहने और ज़लील होने से बेहतर है इस एकाकी मार्ग का संधान करो और हार जाओ, यही निजात मिलेगी
इसी पर बुद्ध चले थे और वे सब जो अपने आप से हार गये थे, इसलिये दुख नही कि मैं भी तत्पर हूँ .....
***
"हिंदी का मास्टर होने का क्या फायदा है" - मैंने फोन करके लाइवा को पूछा
लाइवा चहकते हुए ना चाह कर भी बोला - "जब चाहे तब किताब छपा लो, जितनी चाहे उतनी कविता लिखो - पढ़ाना तो पड़ता है नही, जब चाहे तब अपनी किताब पर चर्चा करवा लो, जब चाहे तब काव्य गोष्ठी रख लो विवि के हॉल में - हॉल फ्री में मिल जाता है, चाय का खर्च विभाग के माथे मढ़ दो, जब चाहे तब किसी भी विभाग में जाकर घूम आओ, जब चाहो तब देशभर में पीएचडी की मौखिक़ी या सेमिनार या शिक्षक भ्रमण के नाम पर घूम आओ, जब चाहो तब बीए, एमए या शोध के बच्चों को इकट्ठा करो और भाषण पेल दो और अमर हो जाओ"
साला, लाइवा इतना समझदार था - मुझे पता नहीं था, इतने दिनों बाद पता चला कि वह स्थानीय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रीडर था - संविदा पर लगा था, बाद में चाट-चाटकर स्थाई हो गया, अब के पोस्ट डॉक्टरेट वाले लौंडो को तो यह मलाईदार चाटन की सुविधा भी उपलब्ध नही है, बापड़े ट्यूशन पढ़ा रहें है
***
"मैं थोड़ी देर बाद कॉल करता हूँ"
"अभी बिजी हूं , मीटिंग में हूं"
"बाजार में हूँ"
"कोई जरूरी काम कर रहा हूं, गाड़ी चला रहा हूं"
"कॉल पर हूँ, एक ज़रूरी मीटिंग चल रही है"
"ऑफिस में मीटिंग है बहुत जरूरी"
या फिर Pre scripted SMS - "I am busy, call you later" और बाद में करता हूँ- कभी नही आता
हर जगह मीटिंग का भयानक खूनी खेल चल रहा है, भगवान जाने काम कैसे हो रहें है, कब हो रहें हैं - अल्लाह के बन्दे मीटिंग में हैं तो, काम कैसे होते है, कैसे संसार चलता है - क्या वाकई भगवान चला रहा यह समूचा संसार
98% दुनिया के लोग इस समय मीटिंग में है, सरकारी से लेकर सड़क पर भीख मांगने वाले ही मीटिंग में है और बहुत बिजी है, इतने कि खाने को टाइम ना है, पानी पीने या दवाई लेने का टाइम ना है किसी को, वो लौंडे जो धक्का खा - खाकर दसवीं - बारहवीं पास हुए सप्लीमेंट्री से - फोन पर कहते है "इम्फाल एयरपोर्ट पर चेक इन कर रहा हूँ, जापान एम्बेसी में हूँ वीजा के लिए आया हूँ"
कॉलेज के मास्टर दिनभर पढ़ाने के बजाय गप्प में लगे है - साहित्य, संस्कार और हिन्दू राष्ट्र बनाने की प्रक्रिया में लगे रहते हैं बापड़े, स्त्रैण कवि अपने छर्रों और उनकी बीबियों की कॉपी पेस्ट पोस्ट्स पढ़कर अहो अहो करते रहते है फोन पर और अश्लील अधनँगे फोटो को निहारते रहते हैं ससुरे पढ़ाते कब है, हिंदी के पीजीटी बाइक पर घूम रहे है कुत्तों के पिल्लों के साथ या बूढ़ी तितलियों को रिझा रहें है पर फोन पर व्यस्त मिलेंगे, रिटायर्ड बूढ़े खब्ती इंस्टाग्राम पर बद्री केदार या अयोध्या के लाईव दिखाकर अपने आपको व्यस्त दिखा रहें - दो कौड़ी की तोतली आवाज़ में घटिया हिंदी के उच्चारण कर रजनीगन्धा की पीक थूकते हुए धर्म पढ़ा रहें है ससुरे
कम्पाउंडर,चपरासी या पुलिस के ठुल्ले साहित्यकार या कहानीकार वाट्सएप्प पर भेंगी और कचरा कवयित्रियों की कविताओं का उद्धार करते और वर्तनी सुधारते मिलेंगे इसलिए फोन व्यस्त है, बाबू, पटवारी, तहसीलदार या प्रमोटी ब्यूरोक्रेट्स अपनी स्टेनो के फोटो खींचकर उसके हुस्न की वर्तनी सुधारकर फोटो चैंपते मिलेंगे, इसलिए फोन व्यस्त है या अर्जी - फर्जी किताबों के बेसिर पैर किताबों के उद्धहरण कॉपी मारकर विद्वान बन रहे है, आधे - अधूरे वाक्य लिखकर ज्ञानी बन रहे हैं
घरेलू किस्म की महिलाएँ इधर वाट्सएप्प से लेकर टिंडर तक जुगाड़ में लगी है इसलिये व्यस्त है
मजेदार यह है कि यह सब खेला एक भयावह शब्द "मीटिंग" के नाम पर चल रहा है - इससे बेहतर है कि फोन ही मत लगाओ किसी को - मरने दो सालों को, बहुत ही ज्यादा जरूरत हो तो व्हाट्सएप पर एक हेलो लिखकर भेज दो, या एक एस एम एस भेज दो कि डूब मरो कम्बख्तों और सब तो छोड़ो बाकी अपने ही बच्चों से बात नहीं हो पाती- तो दुनिया की छोड़ दो
सब अस्त - व्यस्त है, दुनिया मस्त है

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