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GyanPipasu and Drisht Kavi - Posts of 25 Sept 2022

सीधे आयएएस बनने वाला अफसर जब अपने हस्ताक्षर किसी कागज पर बनाता है या नोटशीट पर कुछ लिखता है जैसे चर्चा, तो उसका अर्थ या क़ीमत उसे मालूम नही होती हैं जबकि प्रमोटी अफसर हर हस्ताक्षर की कीमत जानता है, वह चर्चा नहीं लिखता - नोटशीट पढ़कर सीधे संबंधित विभाग के जिला प्रमुख को कमरे में बुलाता है ; सीधी भर्ती से आया अफ़सर नर्स, पटवारी, तृतीय श्रेणी वाले माड़साब या बाबू की कीमत नहीं जानते और प्रमोटी अफसर पटवारी, माड़साब, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और बाबू को खुदा मानते हैं - क्योंकि उन्हें मालूम है कि ये बर्र के छत्ते है और उनके एक खेल से उनकी कुर्सी झटके में हिल जाएगी और कलेक्ट्री निकल जायेगी
एक ही जीवन के बड़े कष्ट है बाबू
***
"क्यो बै तूने वो लेह - लद्दाख, 370 के खात्मे और मणिपुर पर आई किताब पढ़ी थी जो उस लेखक ने खरीदवा दी थी उस दिन", लेखक बड़ा धाँसू था एकदम सेटिंगबाज - मैंने लाईवा को पूछा
"नही, समय नही मिल पाया , एक दिन दो - तीन छात्र आये थे दारू पीने दिल्ली से - उन्हें घुमाता रहा यहाँ - वहाँ , गाड़ी भी ठुक गई, फिर जाते समय उसमे से एक को पकड़ा दी,बहुत मोटी किताब थी, पल्ले भी नही पड़ रही थी " लाईवा उदास था
"फिर आजकल किधर हो" - मैंने पूछा
"बस अपने इष्ट कवि कुलगुरु को तीर्थ यात्रा करा रहा, देशभर में जहाँ भी कोई हिंदी कविता का श्राद्ध होता है या इनामों का बंटवारा होता है - चुके हुए चौहान कवि कुलगुरु इष्ट को दक्षिणा मिलती है, इन्हें जिमाने ले जाता हूँ, और मुझे अपनी कविताएँ झिलवाने का मौका मिल जाता है, बड़े - बूढों के साथ फोटू हिंचवाने का मौका और बाकी दारू, होटल और गाड़ियों का सुख" - बहुत अंदर से आवाज़ आ रही थी लाईवा की
मैंने छेड़ा - "एकाध माताजी को भी कुलदेवी बना लो, अरूणाचल से लेकर लेह - लद्दाख और अप्सा कानून समझने में ज़्यादा मदद करेगी" - उसे मझधार में छोड़कर फोन काट दिया मैंने

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